Jagannath Rath Yatra 2025: आज हम जानेंगे पुरी की रथ यात्रा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी। रथ यात्रा भक्ति, आस्था और भावना का एक ऐसा संगम है, जो की भगवान के भक्तों के मन में आस्था की एक नई ज्योति जलता है। यह पर्व लोगों के बीच ना सिर्फ आस्था और भक्ति का प्रतीक है बल्कि यह मानवता और धर्म का प्रतीक भी है।
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कब है, Jagannath Rath Yatra 2025 (जगन्नाथ रथ यात्रा 2025)
Jagannath Rath Yatra 2025 आषाढ़ महीने की दुइत्या के दिन होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ भ्रमण पर निकले हैं। इस साल यह त्योहार 27 जून, 2025 को दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्योदय सुबह के 05:09 और सूर्यस्थ शाम के 06:52 मिनट पर होगा। उड़ीसा के पुरी में यह त्योहार हरेक वर्ष बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है और यह त्योहार एक विशाल धार्मिक उत्सव का साक्षी बनता है।
पूरे साल में एक बार ही भक्तों के बीच पहुंचते हैं भगवान जगन्नाथ
“पूरे साल में एक बार ही भक्तों के बीच पहुंचते हैं भगवान जगन्नाथ” यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस दिन भगवान जगन्नाथ अपने भाई और बहन (बलभद्र जी और सुभद्रा जी) के साथ विशाल रथ पर बैठकर नगर भ्रमण करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ कुछ दिनों तक (गुंडिचा मंदिर) में ही रहते हैं।

रथयात्रा के समय से पहले ही भगवान जगन्नाथ के मंदिर (गुंडीचा मंदिर) की साफ़ सफ़ाई और सजावट की जाती है।
8 दिन के बाद अपने मुख्य मंदिर में लौटते हैं भगवान जगन्नाथ
गुंडिचा मंदिर में आठ दिनों तक रहने के बाद भगवान अपने भाई और बहन के साथ वापस अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं। और इस लौटने की यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। वापस लौटने की मार्ग में भगवान जगन्नाथ एक स्थान पर रुकते हैं जिसे मौसी माँ मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर माता देवी अर्धशिनी को समर्पित है और इनका धार्मिक महत्त्व बहुत ही अधिक है।
यहाँ रुकता है भगवान का रथ
वैसे तो रथयात्रा से जुड़ा काफ़ी कथा आपने सुना होगा लेकिन आज हम भी आपको एक कथा के बारे में बताने वाले हैं, बताया जाता है की जब हर साल रथ यात्रा निकाली जाती है, तब यह रथ सालबेग की मजार के सामने से गुजरता है तो यह रथ कुछ समय के लिए वहाँ अपने आप रुक जाता है। ऐसा माना जाता है कि सालबेग नाम का यह मुसलमान भगवान जगन्नाथ का बहुत ही बड़ा और प्रिय भक्त था, जिसे की भगवान ने उसके सपने में आकर उसे दर्शन भी दिए थे, उसके बाद उसी समय सालबेग ने प्रभु के चरणों में अपना प्राण त्याग दिया था। बाद में जब भगवान जगन्नाथ का रथ यात्रा निकला, तो भगवान जगन्नाथ का रथ अचानक से मजार के सामने आकर रुक गया। और उस समय भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल हुए सभी श्रद्धालुओं ने भगवान से सालबेग की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। तभी से यह परंपरा बन गई की रथयात्रा के समय भगवान का रथ मजार पर जरूर रुकता है।